chhattisgarh-new-cultural-and-moral-activities-session-2026-27
"शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि श्रेष्ठ चरित्र और संस्कारित समाज का निर्माण करना है।"
विद्यालय केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं होता, बल्कि वह एक ऐसा स्थान होता है जहाँ बच्चों के व्यक्तित्व, संस्कार, अनुशासन और सामाजिक मूल्यों का निर्माण होता है। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए छत्तीसगढ़ शासन के स्कूल शिक्षा विभाग ने नवीन शिक्षा सत्र 2026-27 से प्रदेश के सभी शासकीय विद्यालयों में प्रार्थना सभा, भोजन मंत्र तथा समापन मंत्र की नियमित व्यवस्था लागू की है। इस पहल का उद्देश्य विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ उन्हें भारतीय संस्कृति, परंपराओं और नैतिक मूल्यों से परिचित कराना है।
आज के समय में शिक्षा का दायरा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रह गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी इस बात पर बल देती है कि विद्यार्थियों का विकास केवल अकादमिक उपलब्धियों तक सीमित न होकर उनके नैतिक, सामाजिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक पक्षों को भी सशक्त बनाए। इसी दृष्टिकोण के अनुरूप विद्यालयों में ऐसी गतिविधियों को शामिल किया गया है जो बच्चों के भीतर अनुशासन, राष्ट्रप्रेम, जिम्मेदारी, आत्मविश्वास और सांस्कृतिक चेतना का विकास करें।
नई व्यवस्था के अनुसार प्रत्येक विद्यालय में प्रातःकालीन सभा के दौरान राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत (वंदे मातरम्), दीप मंत्र, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र तथा महापुरुषों की जीवनी का वाचन किया जाएगा। इन गतिविधियों का उद्देश्य विद्यार्थियों में देशभक्ति, ज्ञान के प्रति सम्मान, शिक्षकों के प्रति आदर और महान व्यक्तित्वों से प्रेरणा प्राप्त करने की भावना विकसित करना है। महापुरुषों के जीवन प्रसंग विद्यार्थियों को संघर्ष, परिश्रम, नेतृत्व और सामाजिक उत्तरदायित्व के महत्व को समझने का अवसर प्रदान करेंगे।
मध्याह्न भोजन से पूर्व भोजन मंत्र का सामूहिक उच्चारण किया जाएगा। इससे विद्यार्थियों में भोजन के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और अनुशासन की भावना विकसित होगी। साथ ही सामूहिक सहभागिता और स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूकता भी बढ़ेगी।
विद्यालय की छुट्टी के समय राज्यगीत, गायत्री मंत्र और सर्वकल्याण प्रार्थना (शांति मंत्र) का आयोजन किया जाएगा। राज्यगीत विद्यार्थियों को छत्तीसगढ़ की संस्कृति, परंपराओं और क्षेत्रीय गौरव से जोड़ने का कार्य करेगा। वहीं गायत्री मंत्र और सर्वकल्याण प्रार्थना के माध्यम से सकारात्मक चिंतन, आत्ममंथन, शांति और मानव कल्याण की भावना को प्रोत्साहन मिलेगा।
यह पहल विद्यार्थियों के नैतिक एवं चारित्रिक विकास, सांस्कृतिक जागरूकता, राष्ट्रीय मूल्यों के संवर्धन, सामाजिक उत्तरदायित्व, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक विकास तथा भारतीय ज्ञान परंपरा से परिचय कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे विद्यालयों का वातावरण अधिक अनुशासित, प्रेरणादायक और संस्कारयुक्त बनेगा।
यदि इन गतिविधियों का संचालन केवल औपचारिकता तक सीमित न रहकर उनके अर्थ, उद्देश्य और महत्व के साथ किया जाए तो यह विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो सकता है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल परीक्षा में सफलता प्राप्त करना नहीं, बल्कि एक जागरूक, जिम्मेदार, संवेदनशील और संस्कारित नागरिक का निर्माण करना है। छत्तीसगढ़ शासन की यह पहल इसी दिशा में एक सार्थक प्रयास है।